सोचता हूँ, कैसा वायरस बनाया है, मुख से उत्पन्न श्रेष्ठ-जनों ने ?


आज भी भारत के लगभग 90 प्रतिशत लोग, जातिवादी संकीर्णता से ऊपर उठ नहीं पाए हैं। हालांकि भाषण देने में, तो पूरी दुनिया को परिवार कहते हैं, बोलने को तो पूरा श्लोक बोल जाते हैं, पर व्यवहार एकदम उलट। यह कथनी और करनी का फर्क देखना हो, तो सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों की जाति पता कीजिये। प्रधान सचिव, विश्वविद्यालय का कुलपति, सर्वोच्च नयायालय के जज, मंदिर का पुजारी, पीठों के महंत आदि सभी एक ही तबके से भरे पड़े हैं और आपको ढूंढने से भी दलित, आदिवासी, मुसलमान या पिछड़ा बमुश्किल मिलेगा। 

हालांकि ज्ञान बघारने में कोई कमी नहीं मिलेगी। बोले तो दोमुंहा लोग। एक ही धर्म के भीतर वर्ण-जाति का भेद बनाया, फिर उसी के आधार पर सत्ता को कैसे बहुसंख्य लोगों को वंचित कर दिया गया। आज भी लोकतन्त्र के दौर में भी आरक्षण जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों को देने के लिए प्रतिनिधित्व स्वरूप था, उसे भी तरह तरह से लागू नहीं होने दे रहे। 

जाति-भेद भारत के इंसानों को प्रेम करने और पसंद का विवाह भी करने नहीं देता। शायद इसलिए कि अगर अंतरजातीय विवाह हो गए, तो सत्ता और समाज में जो उनका प्रभुत्व और श्रेष्ठता है, शायद छीन जाएगा। एक ही घर में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ब्याहने लगेंगे, तो फिर कैसे जाति भेद कर पाएंगे यह बात उन्हें अच्छे से मालूम है। आज से नहीं, बल्कि सदियों से। 

सोचता हूँ, कैसा वायरस बनाया है, मुख से उत्पन्न श्रेष्ठ जनों ने ? हर दिन प्रेम और इंसानियत की हत्या उनके बनाये इस वायरस जाति के कारण। क्या श्रेष्ठ जनों पर भी हत्या के आरोप लगने चाहिए, जाति नामक षड्यंत्रकारी व्यवस्था बनाने के लिए ?

    – नैयाकस

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