"कोई भी पैग़म्बर आख़िरी नहीं हो सकता है, दुनिया रोज़ बदलती है..."


पाकिस्तान के इकलौते नोबेल पुरस्कार जीतने वाले भौतिकशास्त्री अब्दुस्सलाम, इस्लाम के अहमदिया पंथ को मानते थे। अहमदिया वो पंथ है जो ये कहता है कि "कोई भी पैग़म्बर आख़िरी नहीं हो सकता है, दुनिया रोज़ बदलती है इसलिए वक़्त वक़्त पर पैग़म्बर आते रहेंगे"। अहमदिया पंथ की ये विचारधारा बहुत व्यवहारिक है। मगर इस्लाम के क़ानून के हिसाब से ये ईशनिंदा है। इसलिए अहमदिया लोगों को पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक देशों में मार डाला जाता है। 

अदुस्सलाम की मौत के बाद उनकी क़ब्र पर लगे पत्थर से "मुस्लिम" शब्द को मिटा दिया गया (जो ऊपर की तस्वीर में आप देख सकते हैं)। ये इस्लाम के मानने वालों का गुस्सा है। उनके हिसाब से ये सबसे बड़ी सज़ा होती है किसी के लिए कि उस से "मुस्लिम" होने का टाइटल छीन लिया जाय।

मुसलमान जब इस्लाम की रीतियों या कुरीतियों से तंग आ जाता है तो वो अपना फ़िरक़ा (पंथ) बदल लेता है। अलग अलग फ़िरक़ों में थोड़ी बहुत ऐसी बातें होती है जो मूल इस्लाम की आदिम विचारधारा से थोड़ा भिन्न होती है। जैसे अब्दुस्सलाम ने अहमदिया होना चुना। कोई शिया हो जाता है। कोई बरेलवी और कोई अहले हदीस। तीन हज़ार से अधिक इस्लामिक पंथ हैं इस समय। 

..और ये पंथ बदलने की प्रैक्टिस सिर्फ़ इसलिए होती हैं ताकि मूल धर्म की रटी रटाई बोरियत से बचे रहें और "ईशनिंदा" में मारे न जाएं। क्योंकि अगर आपने इस्लाम ही छोड़ दिया तो इस्लामिक देशों में आपकी सज़ा मौत है। इसलिए जो आधुनिक विचारधारा वाले होते हैं वो अपनी विचारधारा के सबसे क़रीबी को पंथ चुनते हैं और उसी से ख़ुश हो जाते हैं।

इसीलिए मैं हमेशा लोगों से कहता हूँ कि भारत और पाकिस्तान के पचास प्रतिशत से ज़्यादा मुसलमान दरअसल मुसलमान होते ही नहीं हैं। वो बस इस्लाम मे बने रहते हैं डर की वजह से। वो फ़िरक़े बदलते जाते हैं और सोच लेते हैं कि वो रूढ़िवादी इस्लाम से बाहर निकल आये। ये एक नए तरह का ऑर्गेज़म होता है। फिर वो अपने फ़िरक़े को लेकर दूसरे फ़िरक़े वाले से लड़ते हैं, बहस करते हैं और एक दूसरे को काफ़िर साबित करते हैं। ये दोनों मुसलमान होते हैं मगर ये होते नहीं हैं। एक क़ब्र पूजता है तो दूसरा उसको हराम बोलता है। इसी में ये ज़िन्दगी गुज़ार के निकल लेते हैं।

इस्लाम मे बने रहना इनकी मजबूरी और डर होता है बस। ख़ानदान और समाज का इतना ज़्यादा दबाव होता है कि इन्हें फ़िरक़ा फ़िरक़ा खेलना आसान और भय मुक्त लगता है। मगर ये इस्लाम से कब निकल चुके होते हैं वो ये जान ही नहीं पाते। इन्हें लगता है कि जुम्मा पढ़ लेना और रोज़े रख लेने से ये मुसलमान बने रहते हैं। 

बचपने का ये आलम होता है इनके कि इन्हें लगता है कि किसी को ये कलमा पढ़वा देंगे तो वो मुसलमान बन जायेगा। ऐसे ही ये भी मुसलमान हैं ऐसे ही अब्दुस्सलाम भी मुसलमान थे। ऐसे ही तारिक़ फ़तेह है ऐसे ही हसन निसार हैं। ये भ्रम में जीते हुवे लोग है। मुसलमान घरों में पैदा हो गए तो उसी जाल में फंसे हुवे हैं बस। बोर हो जाएंगे तो सुन्नी से शिया बन जाएंगे या अहमदिया।

अब्दुस्सलाम की कब्र से "मुस्लिम" शब्द हटा कर इन्हें लगता है कि इन्होंने उन्हें ज़लील कर दिया हैवैसे ही ये मेरी पोस्ट पर भी आठ सालों से यही आ कर कहते हैं। नाम क्यूं नहीं बदल लेते, क्यूं मुस्लिम बने हो, क्यूं सिद्दीकी लगाए हो, अरबी में क्यूं नाम है, मरने के बाद जलाए जाओगे या दफ़नाए?" ये सब इन लोगों के लिए यक्ष-प्रश्न होता है। क्यूंकि बचपन से पैदा होते ही इन्हें इसी सब से डराया जाता है। 

इन्हें महिमामंडित कर के बताया जाता है कि "फ़रिश्ते भी ज़मीन पर किसी मुसलमान के घर जन्म लेने के लिए तरसते हैं। मगर ख़ुदा की उन्हें इजाज़त नहीं। ये इंसान ही है जो रसूल की उम्मत में पैदा हो सकता है"। ये सब सुनकर इनके दिलों में मुसलमान होने का दंभ ऐसा घर जाता है जो सारी उम्र निकलना तो दूर, बढ़ता ही जाता है।

अब्दुस्सलाम को यूरोप में बसना चाहिए था और अपना मूल धर्म छोड़ देना चाहिए था। दूसरी नस्लें और दूसरी क़ौमें उन्हें वो इज़्ज़त देतीं जिसके वो हक़दार थे। तस्लीमा समेत तारिक़ फ़तेह को भी यही करना चाहिए। इनकी गालियां खाने का कोई फ़ायदा नहीं होता है। वो सिर्फ़ आपके भीतर कड़वाहट भरता है। जो धर्म आपको अपनी विचारधारा के क़रीब लगे उसे अपनाना चाहिए था। 

नास्तिकता कोई मान्य धर्म नहीं है भारत में इसलिए नास्तिक बने रहना बेबकूफ़ी है। आपको लीगल तरीके से धर्म बदलना होता है। ताकि आपके बाद आपकी नस्लों को कोई तब्लीग़ी खींच न ले जाए और उन्हें उस कुचक्र में फिर न फंसा दे जिस से आप सारी उम्र लड़े हैं। इसलिए अपनी नस्लों को बचाना है तो इन चक्र को तोड़ना ज़रूरी है।

इनसे सारा हक़ छीन लीजिये आपको ज़लील करने का। ट्विटर और फ़ेसबुक समेत हर कहीं इनसे गाली खाने का। अपने जीते जी ऐसी कम्युनिटी या ऐसी सोच वालों का हिस्सा बन जाईये जो भले मुट्ठी भर हों मगर प्यार मुहब्बत और सुकून वाले हों। जो एक दूसरे को हर कहीं गालियां न देते हों। जो हिन्दू और मुसलमान दोनों कम्युनिटी से दूर हों। ताकि आप इनकी भसड़ से निकल कर अपनी खोज पर निकल सकें। जैसे मैंने किया है। क़ानूनी तरीके से। इन सबकी गंद से दूर। एक शांत कम्युनिटी के लोगों का हिस्सा बन कर। बुद्ध जैसे को अपना आदर्श बना कर।

लोग मुझे समझाते थे कि आप ताबिश सिद्दिक़ी बने रहेंगे तो ये आपको पढ़ेंगे और सुनेंगे। मगर मैं हश्र देख रहा हूँ ऐसे मुसलमानों का। मैं इनके खेल का अब हिस्सा नहीं बना रह सकता था। ..और मुझे आपने लिए जीना है। अपने बच्चों को आध्यात्मिक ऊंचाई देनी है, ताकि वो वैज्ञानिक और कलात्मक सृजनकर्ता बन सके बिना इनकी बेबकूफ़ी भरी हराम और हलाल के जाल में फंसे हुवे। ये इतनी भयंकर और इतने निचले स्तर की गंद है कि चालीस साल की उम्र में आने के बाद भी मुझे ये फैसला करना पड़ा कि "बस.. अब और नहीं"।

और आख़िरी बात। मुझे पता है कि "मुस्लिम" टाइटल की क्या अहमियत है आपके लिए। आप कभी दाऊद इब्राहीम या इन जैसों की क़ब्र से "मुस्लिम" शब्द नहीं मिटायेंगे। ग़ाज़ी और हिंसक आपके सबसे बड़े चहेते होते हैं। आपको उनसे चिढ़ और जलन होती है जो आपकी किताबों और आलिमों से ऊपर सोचे। आपके आलिम अब्दुस्सलाम के पैर की धूल नहीं हैं। मगर आपने ऐसा महिमामंडन कर रखा है अपनी बेवकूफियों का कि लोग उसी में फंसे राह जाते हैं पूरी उम्र।

अब आपको आपकी चीज़ें मुबारक। मेरी आपसे अब सारी लड़ाई और जद्दो जहद आज के बाद ख़त्म होती है। जिस जिस चीज़ का आपने मुझे ताना दिया और तंज कसा, वो सब करके दिखा दिया मैंने। अब मेरे पास वो कुछ भी नहीं है जिसे आप छीन कर ख़ुश हो सकें।

    ~ सिद्धार्थ ताबिश 

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